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Ghuisarnath Dham

●●●●●●●●▬▬▬▬▬▬۩बाबा घुइसरनाथ धाम नाम कैसे पड़ा۩▬▬▬▬▬●●●●●●●●●●
प्राचीन काल में सई नदी के किनारे इलापुर(अब कुम्भापुर) नामक गाँव में श्री घुइसर यादव जी थे |वह एक चरवाहे थे और रोज जंगल में जानवर चराने जाते थे, वो बहुत ही नास्तिक थे उनकी ईश्वर में आस्था नहीं थी| वह जंगल में टीले(भीटा) पर ही रोज बैठकर आस पास की गाय-भैंस चराया करते थे क्योंकि भीटा बहुत दूर में था अत: सुबह से शाम तक जानवरों को चराते चराते वो अपना समय काटने के लिये घर से मूंज ले जाया करते थे जिससे वो रस्सियाँ बनाते थे | उसे खूंदने के लिए उन्हें पत्थर ढूढना था अतःउन्होंने वह पत्थर चुना जिसमे वो एक बार अटक कर गिर गए थे क्यों की वह बहुत बड़े वृक्ष के नीचे छावं में भी था और सभी पत्थरों से ज्यादा चमकीला और चिकना था,अब प्रतिदिन घुइसर जी मूंज खूंदते और रस्सी बनाया करते थे| दिव्य पत्थर पर रोज अपनी लाठी से चोट करते और शाम को पत्थर के आस पास साफ़ कर देते और पत्थर को भी अपने अगोंछे से साफ़ कर देते थे क्योंकि अगले दिन उन्हें फिर वहीं बैठना होता था |लेकिन जैसे जैसे वह पत्थर चोट मार रहे थे , उसी तरह वो पत्थर बाहर उपर की तरफ निकल रहा था | आज भी उस दिव्या पत्थर रुपी १२वे ज्योतिर्लिंग घुश्मेश्वर जी में चोट के निशान मौजूद हैं यह कार्य करते करते कई वर्ष बीत गए , एक दिन शाम के समय बहुत बारिश हुई और वह पत्थर को व आस पास की जगह साफ़ कर रहे थे तभी बहुत भयानक आवाज के साथ दिव्या रोशनी हुई और भगवान शंकर उसी पत्थर से प्रकट होकर बोले घुइसर यादव तुमने मेरा सिर इतने दिन दबा के और मेरी सेवा करके मुझे खुश् कर दिया बोलो क्या वरदान चाहते हो मैं तुम्हे मनचाहा वरदान दूंगा | यदुवंशी घुइसर जी नास्तिक थे भगवान को साक्षात् अपने सामने देख वो शिवभक्ति से ओत प्रोत गये उनकी नास्तिकता जाती रही |भगवान शिव जी ने उस शिवलिंग के बारे में उन्हें सारी कहानी बताई की कैसे घुश्मा की भक्ति से वह आये थे और आज फिर दोबारा तुम्हारी निष्काम सेवा से प्रसन्न होकर पुन: जनकल्याण के लिए अवतरित हुए हैं क्योंकि मुझे त्रेता युग में अपने भगवान के दर्शन के लिए यंहा फिर से उद्भव लेना ही था |भगवान राम जी ने वन जाते वक्त भगवान घुश्मेश्वर जी से मुलाकात की थी और यंहा विश्राम भी किया था |जंहा उन्होंने बैठ कर विश्राम किया था उनके पसीने की बूँद वंहा गिरी जिससे वंहा करीर का वृक्ष उत्पन्न हुआ जो आज भी विराजमान है |अत: इस तरह शिव जी ने यदुवंशी घुइसर जी को दर्शन दिया और उनकी नास्तिकता का नाश किया घुइसर जी ने तीन वर मांगे :-

१- मेरे वंशज ही आपकी प्रथम पूजा करें |

२- सात गुना अन्न-जल आपकी सेवा से मुझे और मेरे वंश को हमेशा मिले |

३- मेरे नाम से आपका यह पावन धाम प्रसिद्द हो |

आज भी उनके वंशज श्री शिव मूर्ती गिरी जी हैं और बाबा धाम की सेवा में निरंतर लगे हुए हैं |बिना उनके या उनके पुत्रों के प्रथम पूजन के बगैर कोई बाबा धाम में भगवान घुश्मेश्वर जी की पूजा नहीं कर सकता है और आज भी घुइसर यादव जी के वंशज खुश और सुखी हैं | घुइसर यादव जी के नाम से ही भगवान घुश्मेश्वर जी के धाम का नाम बाबा घुइसरनाथ धाम पड़ा |(यह उपरोक्त इतिहास, कुम्भापुर (घुइसरनाथ धाम) आस पास निवास करने वाले लोगों से प्राप्त की गयी है)

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