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Ghuisarnath Dham

 

●●●●●●●●▬▬▬▬▬▬۩पूजन विधि۩▬▬▬▬▬●●●●●●●●●●

सर्वप्रथम पुजारीजी के द्वारा श्री घुश्मेश्वरजी एवं माँ पार्वती व गणेश जी को गंगाजल से स्नान कराया जाता है । उसके बाद श्री घुश्मेश्वर एवं सभी को चंदन और केसर चढाया जाता है एवं अत्तर का छंटकाव किया जाता है । उसके बाद आरती की तैयारी शुरु होती है । दिये, अगरबत्ती प्रगटायी जाती है ।फूलों से श्रृंगार किया जाता है और आरती के हेतु सभी वाद्ययंत्र एवं शंख का उपयोग किया जाता है और श्री घुश्मेश्वरजी की आरती वाद्ययंत्रो के साथ गायी जाती है । इस दौरान श्री घुश्मेश्वरजी की मनपसंद श्री राम स्तुति का गान होता है । मंदिर में उपस्थित सभी भक्त अनन्य भाव से शामिल होते हैं । सोमवार के दिन श्री घुश्मेश्वरजी का विशिष्ट श्रृंगार किया जाता है |


भगवान घुश्मेश्वर जी की आरती :

आरती भोले भंडारी की | घुश्मेश्वर श्री त्रिपुरारी की ||
शंकर भोले वृषभ विराजैं | घन घन घन घन घंटा बाजै ||
संग गणपति गिरिजा प्यारी की || आरती भोले भंडारी की ..
वैद्यनाथ सोमेश्वर सोईं | चहुँ दिशि जय जय शंकर होई ||
जय जय निसि दिन कमारी की || आरती भोले भंडारी की ..
नीलकंठ प्रभु अवघर दानी | भांग छानते गावैं ज्ञानी ||
जय घुश्मेश्वर दनुजारी की || आरती भोले भंडारी की ..
जो घुश्मेश की आरती गावै | वसि बैकुंठ अमर पद पावै ||
जय आशुतोष असुरारी की || आरती भोले भंडारी की ..
आरती भोले भंडारी की | घुश्मेश्वर श्री त्रिपुरारी की ||


भगवान शिव जी की आरती :

जय शिव ओंकारा, ॐ जय शिव ओंकारा। ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥ ॐ जय शिव ओंकारा.........
एकानन चतुरानन पंचानन राजे। हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे॥ ॐ जय शिव ओंकारा.......................
दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे। त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥ॐ जय शिव ओंकारा..........

अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी। त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥ॐ जय शिव ओंकारा......................
श्वेतांबर पीतांबर बाघंबर अंगे। सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे॥ॐ जय शिव ओंकारा........................
कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूलधारी। सुखकारी दुखहारी जगपालन कारी॥ॐ जय शिव ओंकारा................
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका। प्रणवाक्षर में शोभित ये तीनों एका॥ॐ जय शिव ओंकारा...................

लक्ष्मी व सावित्री पार्वती संगा। पार्वती अर्द्धांगी, शिवलहरी गंगा॥ॐ जय शिव ओंकारा...............................
पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा। भांग धतूर का भोजन, भस्मी में वासा॥ॐ जय शिव ओंकारा...................
जटा में गंग बहत है, गल मुण्डन माला। शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला॥ॐ जय शिव ओंकारा.............

  काशी में विराजे विश्वनाथ, नंदी ब्रह्मचारी। नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥ॐ जय शिव ओंकारा.........

त्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ नर गावे। कहत शिवानंद स्वामी सुख संपति पावे॥ ॐ जय शिव ओंकारा...

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